आदतन
ऊंचे पर्वतों के ऊपर,
श्वेत बर्फ का लिपटा कम्बल
हरे पेडों के बॉर्डर से घिरा|
ऊंचाइयों पे पहुँच कर
देखा लोगों को खेलते
नर्म बर्फ पे गिरते पड़ते
स्की करते बंजी जम्प करते|
मनुष्य - आदतन इच्छा करता है,
ऊंचाइयां छूने की, ऊपर उठने की,
उड़ने की, इच्छाओं को पंख देने की,
आदतन, स्वाभाविक, स्वैच्छिक|
आश्चर्य - पहुँच उन ऊंचाइयों पर,
जहाँ कुछ ही लोग पहुंचे हैं,
गहराई उसे खींचती है,
नीचाई लुभाती है, ललचाती है
आदमी - जो अब तलक,
ऊंचाइयों को लक्ष्य बनाये था,
खींचता चला जाता है,
फिसलता है, कूदता है
ख़ुशी से, स्वेच्छा से, ऊंचाई से
नीचाई तक का सफ़र तय करता है,
तेज और तेज, अवरोध रहित,
तत्पर, आकुल - छूने को धरातल, रसातल|
जिद्द…
नहीं तोड़ेगा कमर वो दुपहरी की धूप में
घर भर का चूल्हा सुलगाने के लिए अब
हम उस इंसान को ही जलाने पे तुले हैं
खोखले वादों से झूठे सपने दिखा और
हालात के तम में भीड़ को गुमराह कर
हम सैलाब का संयम आजमाने पे तुले हैं
देवताओं के बुतों को मंदिरों में बिठाने
और मोम के पुतले महलों में सजाने
हम रोज़ कुछ बस्तियां गिराने पे तुले हैं
विश्व भर को अहिंसक स्वयं को बता कर
दो शब्द करुणा के समझने के लिए अब
हम खुद ही को असमर्थ बताने पे तुले हैं
सदा ही जयते जहाँभर की विषमता पर
आज अपने ही सब अंतर द्वंदों के समक्ष
हम आखिर-कार घुटने टिकाने पे तुले हैं
तब राख से उठने की चाहत लेकर चले थे
ये किस मुकाँ पे आ गए की आज देखो
हम खुद ही को ख़ाक में मिलाने पे तुले हैं
खुद से बहाने
शिक्षा पाने के बहाने रट ली कुछ दो चार पोथी
तथ्य सब कंठस्थ थे पर तत्व बोध हुआ नहीं
जब भी कोई बुद्ध बोधिसत्व की बात बताएगा
तब ज्ञान होने के स्वयं को क्या बहाने देंगे हम
शक्ति पाने के बहाने सदा तन ही बलिष्ठ किया
नसें ढीली पड़ती रहीं दिल हिम्मत खोता गया
जब किसी कठोर निर्णय पे ये कदम डगमगायेंगे
तब साहस होने के स्वयं को क्या बहाने देंगे हम
उम्र भर बस अपना ही सोचा और बाकी गैर रहे
फिर भी अपने ज़मीर के खुद अपने से ही बैर रहे
जब कभी अगर आईने में खुद से रु-ब-रु आयेंगे
तब नज़र मिलाने के स्वयं को क्या बहाने देंगे हम
कल की तैयारी के बहाने सारे आज बिता दिए
वर्ष, मास, हफ्ते की भीड़ में क्षण सारे गुमा दिए
जब कभी ये वक़्त-पात्र रीत कर खाली हो जायेगा
तब कौन से कल के स्वयं को कुछ बहाने देंगे हम
उत्तर ना पा पाए जिनके उन प्रश्नों को ही भुला दिया
व्यर्थ रहा जीवन जो बस बहानों में ही बिता दिया
जब जिंदगी पाने के कारण ज्ञात कभी हुए ही नहीं
तब मौत तुझे जीने के आखिर क्या बहाने देंगे हम
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जानता नहीं हूँ
चला था जहाँ की राहों पे, उस भीड़ में, मदांध
तलाशने सारी खुशियाँ
बढ़ता गया बस - क्यूँ - जानता नहीं हूँ
ज़रूरत, इच्छा, लालसा और फिर बस झक
उस कबाड़ के पहाड़ में
कुछ अपना खो गया - क्या - जानता नहीं हूँ
लक्ष्य सदैव क्षितिज रहा, मरीचिका रही
ऊंचे चढ़े और आगे भागे
कभी देखूंगा पीछे - कब - जानता नहीं हूँ
सदैव आगे या पीछे ही रहे सब, कोई साथ नहीं
जीवन है या कोई दौड़
बस जीत है या हार - किस से - जानता नहीं हूँ
मेरा जीवन, मेरा दिल, मेरा मन, मेरा तन
पूछूँ खुद से खुदा से
आखिर 'मैं' हूँ 'मैं' - कौन - जानता नहीं हूँ
बदलते नज़रिए..
बच्चों के सपनों की ऊंची उड़ान में
बृहद रंगों में, नीले आसमान में
निश्चिन्त आसां खूबसूरत जहान में
चिंता से परे और मस्ती में डूबी
- ज़िन्दगी सलोनी सी
काली पूनम में, सुलगती बयार में
तनहा पलों की लम्बी सी कतार में
भावना शून्य, कठोर और पथरीली
- ज़िन्दगी निर्मम सी
शायर के सुरमयी गीतों के सांचों में
सावन में भादों में, बूंदों बरसातों में,
वसंत के उन सारे मीठे से रागों में
हर मौसम में कल्पित हसीन सी
- ज़िन्दगी खुशगवार सी
अखबारों की सुर्खिओं के जाल में
खोखले राज में, थोथे व्यापार में
बौराई मानवता के काले विस्तार में
उबलते लावे के ठीक ऊपर बैठी
- ज़िन्दगी क्षणभंगुर सी
पुरातन वक़्त की बातों की लड़ी में
बीते किस्सों में, यादों की कड़ी में
झुर्रियों में उलझे प्रश्नों की झड़ी में
ताल पे पड़ते सूरज के अक्स सी
क्षण क्षण बदलती ये ज़िन्दगी
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कोई बात चले...
मद्धिम सूरज, संतरी आकाश, उजले बादलउठती लहर, ढलती शाम, हल्का चाँद
शीतल पवन, शांत साहिल, ढीली रेत और मूंगफली - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले
काली रात, जगमगाता शहर, उजली राहें
भागते वाहन, गलियां रोशन, जर्रा रोशन,
ऊंची मीनार वीरान छत ढेर से तारे और चने के दाने - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले
पहली बारिश, सौंधी मिट्टी, टिन की छत
ठंडा फर्श, खुली खिड़की, हल्के छींटे
जलती अंगीठी, उठता धुआं और गरम भुट्टा - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले
भागती ट्रेन, लम्बा सफ़र, साफ़ आसमान,
झिलमिलाती नदी, लम्बा पुल, दूर पहाड़,
खेत खलिहान, पकती फसल और दाल मोठ - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले
चलती घडी, रुका लम्हा, गहरी सांस
कांपते हौंठ, बढती धड़कन, गूँजता सन्नाटा
खामोश जुबान, बोलती निगाह और.... तृप्ति - बस
फिर हम बैठें तुम बैठो कोई बात चले
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