हिंद युग्म में पूर्व प्रकाशित
वो वक़्त
किस्सों भरा प्रेम ग्रन्थ नहीं गढ़ा हमने
पर उस अल्प कथा का हर वरक था
मेरी हर कॉपी के आखरी पन्ने जैसा
सच्चा, मौलिक, - अपना
ना था पूरी उम्र का साथ अपने नसीब में
पर उस ज़रा से वक़्त का हर दिन था
गर्मियों की छुट्टियों के पहले दिन जैसा
उत्साहित, उतावला, - चंचल
कहने की बात नहीं कि कहा नहीं कुछ
पर अपनी खामोशिओं का सबब था
एकांत हरे उपवन में कोयल की कूक सा
सुरमयी, मीठा, - गुंजित
चाहत, यारी, इश्क, मोहब्बत पता नहीं
पर वो रिश्ता कुछ तो ख़ास था
छन के आती धूप और सूरजमुखी सा
अतुल्य, अनकहा, - अंजान
अंजाम से तो सदा वाकिफ थे ही हम
पर अदभुत वो विदाई का क्षण था
अंतिम परीक्षा की आखरी घंटी जैसा
आज़ाद, निश्चिन्त, - अंतिम
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जानता नहीं हूँ
चला था जहाँ की राहों पे, उस भीड़ में, मदांध
तलाशने सारी खुशियाँ
बढ़ता गया बस - क्यूँ - जानता नहीं हूँ
ज़रूरत, इच्छा, लालसा और फिर बस झक
उस कबाड़ के पहाड़ में
कुछ अपना खो गया - क्या - जानता नहीं हूँ
लक्ष्य सदैव क्षितिज रहा, मरीचिका रही
ऊंचे चढ़े और आगे भागे
कभी देखूंगा पीछे - कब - जानता नहीं हूँ
सदैव आगे या पीछे ही रहे सब, कोई साथ नहीं
जीवन है या कोई दौड़
बस जीत है या हार - किस से - जानता नहीं हूँ
मेरा जीवन, मेरा दिल, मेरा मन, मेरा तन
पूछूँ खुद से खुदा से
आखिर 'मैं' हूँ 'मैं' - कौन - जानता नहीं हूँ
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