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त्रिवेणियाँ

१. 43.jpg

गर्व से दमका था जो खैरात की चांदनी फैलाये  
अमावसी की चादर ओढ़े वो चाँद अब शर्माता है

मेरे यार, उधारी के चिराग कब तक रोशन रहेंगे 

२.

गोल, मुलायम फुल्के तेरे आज बस मेरी यादों में सही  
पर तुझ बिन अब भी वैसी ही रोटियाँ सिका करती हैं

कुछ गोल, कुछ मुलायम, तो कुछ फूली फूली हुईं सी

३.

दंगों के मलबे में जो एक हुए थे मस्जिद ओ मंदिर
आओ अब उसी ढेर से एक हस्पताल बनवाया जाये 

सजदे जिसके लिए किये थे, आज उसी को पाया जाये 42.jpg

४.

सोता हूँ कि सपनों में शायद मिल जाए कहीं तू, पर
हर लम्हा-ए-वस्ल1 पर, खुद को जागा हुआ पाया है

अब हर सुबह तेरी जगह तेरे ख्वाब उठाया करते हैं

 

५.

ज़िन्दगी के जिन जिन पन्नों पे तेरा जिक्र है
उन पे यादों के bookmarks लगा के रक्खे हैं

ज़रूरी सबक revise करने में आसानी रहती है

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Photo Courtesy: Flickr and Flickr

1वस्ल = Meeting, union