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दोहे


गहरी गहरी बात करे, और ऊंचा दाम कमाए  40 (1)
करनी पर जो आन पड़े, सोचे और सकुचाये

माटी सबकी इक है, चाक औ कुम्हार इक,
पानी भर का फर्क है, कुछ क्रूर कुछ नेक.

समय का धर्म बड़ा सरल है, चलता सीध-ए-नाक,
मुड़कर कभी ना देखता, हम कब समझेंगे बात.

जीवन सबका भिन्न है, हैं रहन सहन अनेक, 41.jpg
काल ना कोई भेद करे है, अंत है सबका एक.

जीवन का मोती ढूँढने सब सागर में गोत लगाये,
अपने ज्ञान की नदिया ही, आखिर प्यास बुझाये.

शशि1 के जैसा व्यापारी, हुआ ना अब तक हाय,
रवि की किरनें उधार ले, खुद ही नाम कमाए.

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Photo Courtesy: Flickr and Flickr

शशि – Moon

दे कोई नुस्खा

 

तुझे उम्मीद भी थी और मुझे थी जिद्द भी,31.jpg
न मैं यहाँ से चला न तुम वहां से आ सके

हिज्र1 और विसाल2 के बीच था सिर्फ
पर्दा ए रस्मो रिवाज़ जो हम ना उठा सके

तू आई तो होगी ज़रूर मेरी मजार पे
ऐसा भी क्या की ये वादा भी ना निभा सके

वक़्त, काम, दोस्त, वाल्देन3, समाज
ऐसी झूठी तो तू नहीं कि बहाने बना सके

रहने भी दे यार ये बातें सरहदें4 मिटाने की,
दे कोई नुस्खा5 जो दिलों से दरारें मिटा सके

Photo Courtesy: Flickr

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हिज्र: Separation/Absence
विसाल: Meeting
वाल्देन: Parents
सरहदें: Borders
नुस्खा: Remedy

कोई है

जब अँधियारा गहराता है
और चाँद कहीं सो जाता है 29.jpg
जब शाम का गहरा साया
हर नयी सहर1 पर छाता है
तब रौशनी का भान लिए
दूधिया फैली चांदनी सा,
कोई तो राह दिखाता है

जब सन्नाटा और ख़ामोशी
ही कान में बजती जाती है
सरगम और संगीत हो चुप
आवाज़ भी थक सी जाती है
तब ग़म को इक साज़ बनाकर
तान छेड़कर, नाद बजाकर
कोई तो सुर में गाता है

जब नज़र दूर तलक जाकर
रूआंसी सी लौट के आती है
कहती है कहीं कुछ और नहीं
चहुँ ओर फकत2 इक उदासी है
तब साँसों की आवाज़ में घुल
और सन्नाटे के शोर में मिल
कोई तो आस बंधाता है

जब वक़्त की चलती रेतघड़ी3 से
हर पल छन-छन के गिरता है 33.jpg
और काल का बहता दरिया भी
कुछ थम-थम कर के चलता है
तब दुःख से भारी लम्हे चुनकर
और यादों की झालर में बुनकर
कोई तो समय कटाता है

जब खुद की ही परछाई
पर की छाया हो जाती है
मुरझायी और झुकी झुकी 
अपनी काया हो जाती है
तब उम्मीद का स्पर्श4 लिए
हिम्मत की डोर बांधकर
कोई तो मुझे चलाता है

Photo Courtesy: Flickr and Flickr 
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सहर – Morning
फकत – Only
रेतघड़ी – Hourglass
स्पर्श – Touch

ज़िन्दगी को चखता जा

 

और मिलें ना कहने वालें 28.jpg
तू खुद से बातें करता जा |

अरण्य1 घने हों, राह अँधेरी 
तू मन को रोशन करता जा | 
 
रास्ते के काँटों को उखाड़कर
तू रात की रानी रखता जा |

कट के ना गिर गिरना हो तो
तू आबशारों2 सा गिरता जा |

तेरे मन में जो कुछ भी हो
तू वही जुबान पे रखता जा |

मीठी, खट्टी, तीखी, कसैली3
तू ज़िन्दगी को चखता जा |

Photo Courtesy: Flickr

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अरण्य : Forest 
आबशार : Waterfall
कसैली : Bitter

ऐतबार उठाते हैं


किसी महफ़िल में तेरी बात जो कभी दिलदार उठाते हैं
कुछ बन्दे अशआर बहाते हैं तो कुछ तलवार उठाते हैं

घूमता पहिया है किस्मत का हुजूर देखो बस कल ही तक
आँख उठा ना सके थे जो, अब हाथ वो सरकार उठाते हैं

वो जब खुद भटकते फिर रहे प्रश्नों की भूल भुलैय्या में,
तब आप क्यों उलझे उलझे सवाल बार बार उठाते हैं

बाज़ार कितना और उठा, आदमी कितना और गिरा
बस यही तो जानने को हम सुबह अखबार उठाते हैं

कहाँ पर लेकर जाएगा ये दौर-ए-तैश-ए-आवाम देखो,
जहाँ चैन ओ अमन रखने को सब हथियार उठाते हैं

बुझी नफरत की आग तो हाथ तापना आखिर बंद हुआ,
अब उसी की राख अपने हाथ धोने को मेरे यार उठाते हैं

बरसों तलक रहकर मेरा हमराज़ आज कहा है उसने,
अब वक्त हो चला है पन्त, तुम्हारा ऐतबार उठाते हैं

Image Courtesy: Flickr

आदतन

कल शाम देखा था,
ऊंचे पर्वतों के ऊपर,
श्वेत बर्फ का लिपटा कम्बल
हरे पेडों के बॉर्डर से घिरा|

ऊंचाइयों पे पहुँच कर
देखा लोगों को खेलते
नर्म बर्फ पे गिरते पड़ते
स्की करते बंजी जम्प करते|

मनुष्य - आदतन इच्छा करता है,
ऊंचाइयां छूने की, ऊपर उठने की,
उड़ने की, इच्छाओं को पंख देने की,
आदतन, स्वाभाविक, स्वैच्छिक|

आश्चर्य - पहुँच उन ऊंचाइयों पर,
जहाँ कुछ ही लोग पहुंचे हैं,
गहराई उसे खींचती है,
नीचाई लुभाती है, ललचाती है

आदमी - जो अब तलक,
ऊंचाइयों को लक्ष्य बनाये था,
खींचता चला जाता है,
फिसलता है, कूदता है

ख़ुशी से, स्वेच्छा से, ऊंचाई से
नीचाई तक का सफ़र तय करता है,
तेज और तेज, अवरोध रहित,
तत्पर, आकुल - छूने को धरातल, रसातल|