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एक आदमी और मरा है

 

कुछ दोस्तों के प्रहार से
कुछ नियति की मार से 
एक आदमी और मरा है
पीठ में हो या दिल में
कहीं कोई खंजर गड़ा है

गिरकर उठकर बारम्बार 17
सहके वक़्त की थोड़ी मार
एक आदमी और मरा है
सांस तो चल ही रही है
इसीलिए ज़ख्म हरा है

जीवन की भेड़चाल से
या बंदूकों की नाल से 
एक आदमी और मरा है
दिमाग मेरा खोया-सोया
मन वैसे ही अधमरा है

धर्मों की पोथी पढ़कर या
कर्मों का लेखा लिखकर
एक आदमी और मरा है
फूटना था अपने सर पे ये,
अपने ही पापों का घड़ा है

ख्वाबों का अम्बार लिए
कुछ दारुण पुकार लिए
एक आदमी और मरा है
शीत के अंधड़ तूफानों में
इक पीपल शायद गिरा है

 

Photo Courtesy: Flickr

Dedicated To: Srikant Verma’s poem Hastakshep/Magadh

जिद्द…

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नहीं तोड़ेगा कमर वो दुपहरी की धूप में 
घर भर का चूल्हा सुलगाने के लिए अब   
हम उस इंसान को ही जलाने पे तुले हैं


खोखले वादों से झूठे सपने दिखा और  
हालात के तम में भीड़ को गुमराह कर
हम सैलाब का संयम आजमाने पे तुले हैं

देवताओं के बुतों को मंदिरों में बिठाने
और मोम के पुतले महलों में सजाने  
हम रोज़ कुछ बस्तियां गिराने पे तुले हैं

विश्व भर को अहिंसक स्वयं को बता कर
दो शब्द करुणा के समझने के लिए अब 
हम खुद ही को असमर्थ बताने पे तुले हैं

सदा ही जयते जहाँभर की विषमता पर 
आज अपने ही सब अंतर द्वंदों के समक्ष
हम आखिर-कार घुटने टिकाने पे तुले हैं

तब राख से उठने की चाहत लेकर चले थे 
ये किस मुकाँ पे आ गए की आज देखो
हम खुद ही को ख़ाक में मिलाने पे तुले हैं

Photo Courtesy: Flickr